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30 Nov
World, Breaking news
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UN की कड़ी फटकार के बाद पाकिस्तान की छटपटाहट: असीम मुनीर को मिली बढ़ी ताकत पर दुनिया की नज़र, क्या बोला इस्लामाबाद?

पाकिस्तान की सियासत एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर सवालों के घेरे में है। सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर को अप्रत्यक्ष रूप से और अधिक शक्ति देने वाले 27वें संवैधानिक संशोधन पर अब संयुक्त राष्ट्र (UN) ने गंभीर चिंता जताई है।
जिनेवा से निकले UN मानवाधिकार आयोग (OHCHR) के बयान के बाद पाकिस्तान की वैश्विक स्तर पर बड़ी किरकिरी हुई है, जिसके बाद अब सरकार मजबूर होकर सफाई देने में जुट गई है।

यह विवाद केवल एक संशोधन तक सीमित नहीं है—बल्कि यह पाकिस्तान की न्यायपालिका की स्वतंत्रतासैन्य जवाबदेही, और देश के लोकतांत्रिक ढांचे की दिशा पर बड़े प्रश्न खड़े करता है।


UN ने क्यों लगाई लताड़?

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क ने पाकिस्तान के हालिया संशोधन को लेकर बेहद सख्त टिप्पणी की।
उनका कहना था कि:

“जैसे 2023 में 26वां संशोधन बिना आवश्यक परामर्श के पारित किया गया था, वैसे ही मौजूदा संवैधानिक संशोधन को भी कानूनी समुदाय, नागरिक समाज और हितधारकों से चर्चा किए बिना जल्दबाजी में लागू कर दिया गया है।”

तुर्क ने चेताया कि—

  • संशोधन से न्यायिक स्वतंत्रता कमजोर होती है

  • सेना की जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठते हैं

  • लोकतांत्रिक संरचना को नुकसान पहुंचने का खतरा है

यह UN का एक सीधा संकेत है कि पाकिस्तान में सत्ता का संतुलन—जो पहले ही सेना की ओर झुका हुआ माना जाता है—और अधिक बिगड़ रहा है।


UN की आलोचना पर पाकिस्तान बौखलाया, पेश की सफाई

UN की टिप्पणी के बाद पाकिस्तान ने लगभग तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए सफाई पेश की। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया:

“पाकिस्तान, सभी संसदीय लोकतंत्रों की तरह, अपने संविधान में संशोधन करने में पूर्ण रूप से स्वतंत्र है। यह अधिकार जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के पास है।”

सरकार ने UN के बयान को “एकतरफा, अपूर्ण और वास्तविक स्थिति का गलत चित्रण” करार दिया।

पाकिस्तान का तर्क:

  • संविधान संशोधन आंतरिक विषय है

  • पाकिस्तान मानवाधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है

  • उच्चायुक्त को पाकिस्तान की संसद के संप्रभु फैसलों का सम्मान करना चाहिए

हालांकि, पाकिस्तान की यह सफाई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों को संतुष्ट नहीं कर पाई है, क्योंकि बयान में सबसे महत्वपूर्ण बातें—न्यायपालिका की शक्तियों को सीमित करना, सेना को मजबूत बनाना—उन पर कोई ठोस जवाब नहीं दिया गया।


अंदर ही अंदर पाकिस्तान में भी चल रहा है विरोध

UN की टिप्पणी से पहले ही पाकिस्तान के भीतर इस संशोधन को लेकर भारी असंतोष था।

इस महीने की शुरुआत में जब 27वें संविधान संशोधन को संयुक्त संसदीय समिति ने मंजूरी दी थी, तो विपक्ष, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और कई पूर्व न्यायाधीशों ने इसे:

  • “सुप्रीम कोर्ट की स्वायत्तता पर हमला”

  • “गुप्त सैन्य विस्तार की कवायद”

  • “लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की राजनीति”

बताया था।

विशेष रूप से इमरान खान की पार्टी PTI ने इसे
सेना प्रमुख असीम मुनीर की शक्ति को संवैधानिक सुरक्षा देने वाला कदम बताया।


क्या है 27वां संशोधन? क्यों मचा है इतना बवाल?

इस संशोधन ने पाकिस्तान में शक्ति संतुलन को बदलने की दिशा में कई बड़े बदलाव किए हैं।

1. अनुच्छेद 243 में बड़ा बदलाव

सबसे बड़ा संशोधन किया गया है आर्टिकल 243 में—जो सेना की नियुक्तियों और अधिकारों का आधार है।

  • इसमें “चेयरमैन ज्वॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी” के पद को हटाकर

  • नया पद “चेयरमैन डिफेंस अथॉरिटी” (Chief Defence Authority) बनाया गया है।

इस नए पद को
और अधिक व्यापक शक्तियां दी गई हैं—जो सीधे सेना प्रमुख से जुड़ती दिखाई देती हैं।

अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इसे असीम मुनीर की पावर को संस्थागत रूप से मजबूत करने वाला कदम मान रहे हैं।


2. नया “संघीय संवैधानिक न्यायालय” स्थापित

संशोधन के तहत पाकिस्तान में एक नया
Federal Constitutional Court (FCC)
सृजित किया गया है।

यह न्यायालय:

  • संविधान से जुड़े मामलों की सुनवाई करेगा

  • सुप्रीम कोर्ट की कई संवैधानिक शक्तियों को अपने हाथ में ले लेगा

इससे पाकिस्तान का सर्वोच्च न्यायालय
कमजोर,
और सरकार-सेना गठबंधन
मजबूत
होता दिखाई देता है।


3. सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों में कटौती

सबसे विवादित प्रावधान:

  • सुप्रीम कोर्ट की सुओ मोटू (स्वतः संज्ञान) शक्तियों को सीमित किया गया

  • संवैधानिक व्याख्या से जुड़े मामलों को नए FCC को भेजा जाएगा

  • जजों की नियुक्तियों में सरकार का प्रभाव बढ़ जाएगा

यह सीधे तौर पर पाकिस्तान की न्यायिक प्रणाली में
सत्ता का झुकाव कार्यपालिका और सेना की ओर ले जाता है।


क्यों कहा जा रहा है कि यह संशोधन असीम मुनीर की शक्तियों को बढ़ाता है?

यह प्रश्न पूरे विवाद का मूल है।

1. डिफेंस अथॉरिटी का नया पद—सीधे सेना प्रमुख के प्रभाव में

नए पद की नियुक्ति शक्ति, सूचना प्रवाह और रक्षा नीतियों पर कब्जा
पाकिस्तान की सेना की भूमिका को संवैधानिक रूप से और अधिक मज़बूत करता है।

2. न्यायपालिका की शक्ति सीमित = सैन्य मामलों में कम दखल

अतीत में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने:

  • सैन्य दखल

  • अवैध गिरफ्तारी

  • मानवाधिकार हनन

पर सेना को कई बार चुनौती दी थी।

अब FCC के गठन के बाद सेना के खिलाफ
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप कम हो जाएगा

3. सरकार पहले ही ‘सेना-समर्थित’ मानी जा रही है

विशेषकर जब पीएम शहबाज शरीफ की सरकार पर
सेना के साथ गठजोड़ के आरोप लगते रहे हैं।

संशोधन से स्पष्ट संकेत मिलता है कि सत्ता की वास्तविक चाबी
सेना प्रमुख असीम मुनीर के हाथों में और मजबूती से पकड़ाई जा रही है।


UN क्यों हो गया नाराज?

UN मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क को दो बातों पर सबसे ज्यादा आपत्ति है:

1. संशोधन जल्दबाजी में और बिना परामर्श के

नागरिक समाज, वकील, विशेषज्ञ—किसी से राय नहीं ली गई।

2. मानवाधिकार और न्यायिक स्वतंत्रता पर खतरा

अगर न्यायपालिका कमजोर होती है, तो:

  • मानवाधिकार हनन पर निगरानी ढीली पड़ती है

  • सुरक्षा एजेंसियों के दुरुपयोग का खतरा बढ़ जाता है

  • राजनीतिक विपक्ष दबाया जा सकता है

UN का मानना है कि पाकिस्तान में पहले से ही मानवाधिकार स्थिति चिंताजनक है—
ऐसे में न्यायपालिका की शक्तियों में कटौती एक खतरनाक कदम है।


क्या वाकई यह कदम पाकिस्तान के लोकतंत्र के लिए खतरा है?

राजनीतिक विशेषज्ञों का विश्लेषण बताता है कि:

  • पाकिस्तान में हमेशा से सेना का दबदबा रहा है

  • सिविल सरकारें अक्सर सेना पर निर्भर रहती हैं

  • न्यायपालिका ही एक संस्था थी जो कभी-कभी सैन्य शक्ति को चुनौती देती थी

अब, 27वें संशोधन के बाद:

  • न्यायपालिका कमजोर

  • कार्यपालिका सेना पर निर्भर

  • सेना को संवैधानिक सुरक्षा

यह परिदृश्य पाकिस्तान को कठोर सैन्य-प्रधान लोकतंत्र (Hybrid Regime) की ओर ले जाता हुआ दिखाई देता है।


जनता की क्या प्रतिक्रिया है?

सोशल मीडिया पर इस संशोधन के खिलाफ तेजी से नाराज़गी देखने को मिली।
#SaveJudiciary, #AseemMunir और #UNWarning जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।

कई नागरिकों ने इसे पाकिस्तान के अगले:

  • Chief Justice Crisis

  • Judicial Martial Law

की शुरुआत बताया।


क्या UN की फटकार से पाकिस्तान पर कोई असर पड़ेगा?

यद्यपि UN के पास मजबूर करने की शक्ति नहीं होती,
परंतु यह:

  • पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि

  • IMF और अन्य वित्तीय संस्थानों से होने वाली बातचीत

  • मानवाधिकार रिपोर्टों

  • EU के GSP+ लाभ

पर सीधा प्रभाव डाल सकता है।

अगर पाकिस्तान ने UN को नज़रअंदाज़ किया,
तो आने वाले महीनों में वैश्विक दबाव और बढ़ सकता है


निष्कर्ष: असीम मुनीर की बढ़ती ताकत और पाकिस्तान का भविष्य

27वें संशोधन ने पाकिस्तान की राजनीति में एक बड़ा भूचाल खड़ा कर दिया है।
UN की आलोचना ने इसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना दिया है।

मुख्य सवाल हैं:

  • क्या न्यायपालिका वाकई कमजोर हो रही है?

  • क्या यह सेना प्रमुख असीम मुनीर को संवैधानिक रूप से अधिक शक्तिशाली बनाने की रणनीति है?

  • क्या पाकिस्तान एक और हाइब्रिड लोकतंत्र का चरण देखने जा रहा है?

इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों की सियासी घटनाओं में छिपे हैं।
लेकिन इतना तय है—
UN की फटकार ने पाकिस्तान को बचाव की मुद्रा में ला दिया है, और दुनिया की निगाहें अब इस्लामाबाद पर टिकी हैं।

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