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विकास के दावों के बीच एक कड़वी हकीकत
बिहार सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने और ग्रामीण क्षेत्रों तक बेहतर चिकित्सा पहुँचाने के बड़े-बड़े दावे करती है। ‘हर गांव में अस्पताल’ जैसे नारे कागजों पर तो सुनहरे लगते हैं, लेकिन धरातल पर स्थिति इसके विपरीत नजर आती है। इसका जीवंत उदाहरण पश्चिम चंपारण जिले के योगापट्टी प्रखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत राज ढ़ढ़वा में देखने को मिल रहा है। यहाँ करोड़ों रुपये की लागत से एक शानदार अस्पताल भवन तो बनकर तैयार है, महीनों बाद भी यह जनता के किसी काम नहीं आ रहा है।
पंचायत सरकार भवन के साये में बदहाली
ढ़ढ़वा पंचायत में पंचायत सरकार भवन के ठीक बगल में इस उप-स्वास्थ्य केंद्र का निर्माण कराया गया है। दूर से देखने पर इसकी चमचमाती दीवारें यह आभास कराती हैं कि ग्रामीणों के लिए अब इलाज की राह आसान हो गई होगी। भवन पूरी तरह तैयार है, खिड़की-दरवाजे लग चुके हैं, रंग-रोगन हो चुका है, लेकिन इसके अंदर की रिक्तता सरकारी सिस्टम पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है।
न डॉक्टर, न स्टाफ: ताले में कैद स्वास्थ्य सेवाएँ
एक अस्पताल की आत्मा उसके डॉक्टर और नर्स होते हैं। ढ़ढ़वा के इस नवनिर्मित अस्पताल में अभी तक एक भी डॉक्टर की नियुक्ति नहीं की गई है। यहाँ न तो कोई एएनएम बैठती है और न ही कोई कर्मचारी। आलम यह है कि अस्पताल का गेट अक्सर ताले में बंद रहता है। सरकार ने ईंट-गारे का ढांचा तो खड़ा कर दिया, लेकिन उन धड़कनों का इंतजाम करना भूल गई जो एक मरीज की जान बचा सकें।
बेड तक का अभाव: खाली पड़े हैं वार्ड
अस्पताल के अंदर का नजारा और भी भयावह है। चिकित्सा उपकरणों की बात तो दूर, यहाँ मरीजों के लिए एक बेड (बिस्तर) तक उपलब्ध नहीं कराया गया है। वार्ड के कमरे खाली पड़े हैं और फर्श पर धूल जम रही है। बिना बेड और बुनियादी फर्नीचर के, यह भवन किसी अस्पताल जैसा नहीं लगता। सवाल यह है कि यदि आपातकाल में किसी मरीज को भर्ती करने की जरूरत पड़े, तो क्या उसे फर्श पर लिटाया जाएगा? प्रशासन की यह लापरवाही दर्शाती है कि उनके लिए केवल ढांचा खड़ा करना ही लक्ष्य था।
ग्रामीणों का बढ़ता आक्रोश और वायरल वीडियो
इस अव्यवस्था को लेकर ढ़ढ़वा पंचायत के लोगों में भारी गुस्सा है। हाल ही में इस अस्पताल की दुर्दशा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में ग्रामीण अस्पताल के खाली कमरों, गायब बेडों और बंद पड़े दरवाजों को दिखाकर प्रशासन को घेर रहे हैं। सोशल मीडिया पर लोग मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री का ध्यान इस ओर खींचने की कोशिश कर रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि चुनाव के बाद जनता को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है।
इलाज के लिए मीलों का सफर: जान पर जोखिम
ढ़ढ़वा एक ग्रामीण क्षेत्र है जहाँ रात के समय यदि किसी की तबीयत बिगड़ जाए, तो उसे योगापट्टी या बेतिया ले जाने में घंटों लग जाते हैं। कई बार गंभीर स्थिति में अस्पताल पहुँचने से पहले ही मरीज दम तोड़ देता है। यदि यह स्थानीय अस्पताल सुचारू रूप से चालू होता, तो कम से कम प्राथमिक उपचार तो समय पर मिल जाता। लेकिन बेड और डॉक्टर के अभाव में यह भवन केवल एक ‘शोपीस’ बनकर रह गया है।
प्रशासनिक चुप्पी और व्यवस्था पर सवाल
हैरानी की बात यह है कि भवन पूरी तरह तैयार होने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग ने इसकी सुध क्यों नहीं ली? क्या उपकरणों और स्टाफ के लिए कोई योजना नहीं बनाई गई थी? क्या इसकी संचालन की फिक्र किसी को नहीं है।
ग्रामीणों की मांग
ग्राम पंचायत राज ढ़ढ़वा के इस अस्पताल की स्थिति व्यवस्था का आईना है। जनता की मांग स्पष्ट है:
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अस्पताल में तुरंत बेड और आवश्यक उपकरणों की आपूर्ति की जाए।
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डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ की स्थायी नियुक्ति सुनिश्चित हो।
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अस्पताल को जल्द से जल्द आम जनता के लिए खोला जाए।

